कुछ अति बुद्धिमान लोग कहते हैं की हिन्दू शब्द फारसियों की देन है ।क्यूंकि इसका उल्लेख वेद पुराणों में नहीं है।
अरे मूर्खों तुम क्या सोचते हो दो चार शब्द जान लेने या पढ़ लेने मात्र से तुम सनातन धर्म की व्यापकता और विराटता की थाह पा सकोगे कदापि नहीं भूल जाओ ।
खैर..............।
अब आँखे खोल कर पढ़ लो.............
1-ऋग्वेद के ब्रहस्पति अग्यम में हिन्दू शब्द का उल्लेख इस प्रकार आया है......
"हिमलयं समारभ्य यावत इन्दुसरोवरं ।
तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते।।
(अर्थात हिमालय से इंदु सरोवर तक देव निर्मित देश को हिंदुस्तान कहते हैं )
2- सिर्फ वेद ही नहीं......बल्कि..मेरूतंत्र ( शैव ग्रन्थ ) में हिन्दू शब्द का उल्लेख इस प्रकार किया गया है.....
"हीनं च दूष्यतेव् हिन्दुरित्युच्च ते प्रिये।"
( अर्थात... जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं )
3- और इससे मिलता जुलता लगभग यही यही श्लोक कल्पद्रुम में भी दोहराया गया है.......
" हीनं दुष्यति इति हिन्दू ।"
( अर्थात जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते है। )
4- पारिजात हरण में हिन्दू को कुछ इस प्रकार कहा गया है....
" हिनस्ति तपसा पापां दैहिकां दुष्टं ।
हेतिभिः श्त्रुवर्गं च स हिन्दुर्भिधियते ।।"
(अर्थात जो अपने तप से शत्रुओं का दुष्टों का और पाप का नाश कर देता है वही हिन्दू है )
5- माधव दिग्विजय में भी हिन्दू शब्द को कुछ इस प्रकार उल्लेखित किया गया है........
"ओंकारमन्त्रमूलाढ्य पुनर्जन्म द्रढ़ाश्य:।
गौभक्तो भारतगरुर्हिन्दुर्हिंसन दूषकः ।।
( अर्थात.... वो जो ओमकार को ईश्वरीय धुन माने कर्मों पर विश्वास करे,गौपालक रहे तथा बुराईयों को दूर रखे वो हिन्दू है )
6- केवल इतना ही नहीं हमारे ऋगवेद ( ८:२:४१ ) में विवहिन्दू नाम के बहुत ही पराक्रमी और दानी राजा का वर्णन मिलता है जिन्होंने 46000 गौमाता दान में दी थी...........
और ऋग्वेद मंडल में भी उनका वर्णन मिलता है।
7- ऋग वेद में एक ऋषि का उल्लेख मिलता है जिनका नाम सैन्धव था जो मध्यकाल में आगे चलकर "हैन्दव/हिन्दव" नाम से प्रचलित हुए ...
जिसका बाद में अपभ्रंश होकर हिन्दू बन गया।....!!
8- इसके अतिरिक्त भी कई स्थानों में हिन्दू शब्द उल्लेखित है.......।।।
इसलिये गर्व से कहो हम हिंदू है
Wednesday, 16 December 2015
हिन्दू शब्द की उत्पति
Friday, 11 December 2015
हिन्दू सनातन धर्म
सनातन हिन्दु धर्म में मंत्र जप का अधिक महत्व है, मंत्र का जप करने के लिए जिस माला का प्रयोग किया जाता है, उसमें १०८ मोतियां होती हैं, लेकिन आप जानते हैं कि इन मोतियों की संख्या १०८ ही क्यों होती है।
मान्यता के अनुसार माला के १०८ दाने और सूर्य की कलाओं का रहस्यपूर्ण संबंध है। एक वर्ष में सूर्य २१६००० कलाएं बदलता है और वर्ष में दो बार अपनी स्थिति भी बदलता है। छह माह उत्तरायण रहता है और छह माह दक्षिणायन। अत: सूर्य छह माह की एक स्थिति में १०८००० बार कलाएं बदलता है।
१०८ मोतियों की माला से ही क्यों करते हैं जाप? हिन्दु धर्म में मंत्र जप का खास महत्व है, मंत्र का जप करने के लिए जिस माला का प्रयोग किया जाता है,
इसी संख्या १०८००० से अंतिम तीन शून्य हटाकर माला के १०८ मोती निर्धारित किए गए हैं। माला का एक-एक दाना सूर्य की एक-एक कला का प्रतीक है। सूर्य ही एकमात्र साक्षात दिखने वाले देवता हैं, इसी कारण से सूर्य की कलाओं के आधार पर दानों की संख्या १०८ निर्धारित की गई है।
मान्यता ये भी है कि ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुल २७ नक्षत्र बताए गए हैं। हर नक्षत्र के ४ चरण होते हैं और २७ नक्षत्रों के कुल चरण १०८ ही होते हैं। माला का एक- एक दाना नक्षत्र के एक- एक चरण का प्रतिनिधित्व करता है।
वंदे मातरम् ......
(-}-► ओंकर
धर्म और सत्यता
विभिन्न धर्मों में पाप-पुण्य को लेकर मान्यताओं की तुलना
1. ईसाइयत- हर व्यक्ति जन्म से पापी हैं क्यूंकि सृष्टि के आदि में हव्वा (Eve) और आदम (Adam) ने बाइबिल के ईश्वर के आदेश की अवमानना की थी। इसलिए ईश्वर ने हव्वा को शाप देकर पापी करार दिया था। इस पाप से बचाने वाला केवल एक मात्र ईसा मसीह है क्यूंकि वह पापों को क्षमा करने वाला है। इसलिए केवल ईसा मसीह पर विश्वास लाने वाला ही स्वर्ग का अधिकारी होगा। इसलिए ईसा मसीह को मानो और अपने पाप से मुक्ति प्राप्त करो। क्यूंकि केवल ईसा मसीह ही मुक्ति प्रदाता है।पापों को करने से रोकने के स्थान पर ईसा मसीह पर विश्वास को अधिक महत्व दिया गया हैं। यह मान्यता एक पाखंड के समान दिखती हैं कि अगर कोई व्यक्ति कोई भी पाप कर्म न करे मगर ईसा मसीह पर विश्वास न करे तो भी वह नरक में जायेगा क्यूंकि वह जन्म से पापी हैं।
2. इस्लाम- पाप न करने के लिए कुछ आयतों के माध्यम से सन्देश अवश्य दिया गया है। मगर पाप को न करने से अधिक महत्व इस्लाम की मान्यतों को दिया गया हैं। मुस्लिम समाज के लिए आचरण से अधिक महत्वपूर्ण मान्यताएं हैं। जैसे ईद की दिन निर्दोष पशुओं की हत्या करना उनके लिए पाप नहीं हैं क्यूंकि यह इस्लामिक मान्यता हैं। जैसे जिहाद के नाम पर निर्दोषों को मारना भी पाप नहीं हैं, अपितु पुण्य का कार्य हैं क्यूंकि इसके परिणाम स्वरुप जन्नत और हूरों के भोग की प्राप्ति होगी। क़ुरान के ईश्वर अल्लाह से अधिक महत्वपूर्ण पैगम्बर मुहम्मद साहिब प्रतीत होते हैं। यह मान्यता है, यह विश्वास है। इस्लाम में पाप-पुण्य कर्म से अधिक मान्यतों को महत्व उसे धर्म नहीं अपितु मत सिद्ध करता हैं।
3. वेदों में मनुष्य और ईश्वर के मध्य न कोई मुक्तिदाता हैं, न कोई मध्यस्थ हैं। मनुष्य और ईश्वर का सीधा सम्बन्ध हैं। मान्यता या विश्वास से अधिक सत्यता एवं यथार्थ को महत्व दिया गया हैं। सम्पूर्ण वेदों में अनेक मंत्र मनुष्य को पाप कर्म न करने एवं केवल पुण्य कर्म करे का सन्देश देते हैं। वेद पाप क्षमा होना नहीं मानता। क्यूंकि कर्मफल सिद्धांत के अनुसार जो जैसा कर्म करेगा वैसा फल प्राप्त करेगा। पाप क्षमा होने से मनुष्य कभी पाप क्षमा करना नहीं छोड़ेगा अपितु भय मुक्त होकर ओर अधिक पापी बनेगा। वेद मनुष्य को पाप कर्मों का त्याग करने के लिए संकल्प करने का सन्देश देते हैं। संकल्प को प्रबल बनाने के लिए वेद ईश्वर कि स्तुति प्रार्थना एवं उपासना कर आध्यात्मिक उन्नति करने का विधान बताते हैं। जितना जितना मनुष्य उन्नति करता जायेगा, पाप आचरण से विमुख होता जायेगा। उतना उतना उसके कर्म पुण्य मार्ग को प्रशस्त करेंगे। वैदिक विचारधारा में मनुष्य के कर्म सर्वोपरि है न की मान्यता, विश्वास अथवा मध्यस्ता। व्यवहारिक, क्रियात्मक एवं प्रयोगात्मक दृष्टि से केवल वेदों की कर्मफल व्यवस्था सत्य के सबसे निकट हैं।
Mharana Prtap / महाराणा प्रताप
नाम - कुँवर प्रताप जी (श्री महाराणा प्रताप सिंह जी)
जन्म - 9 मई, 1540 ई.
जन्म भूमि - कुम्भलगढ़, राजस्थान
पुण्य तिथि - 29 जनवरी, 1597 ई.
पिता - श्री महाराणा उदयसिंह जी
माता - राणी जीवत कँवर जी
राज्य - मेवाड़
शासन काल - 1568–1597ई.
शासन अवधि - 29 वर्ष
वंश - सुर्यवंश
राजवंश - सिसोदिया
राजघराना - राजपूताना
धार्मिक मान्यता - हिंदू धर्म
युद्ध - हल्दीघाटी का युद्ध
राजधानी - उदयपुर
पूर्वाधिकारी - महाराणा उदयसिंह
उत्तराधिकारी - राणा अमर सिंह
अन्य जानकारी -
महाराणा प्रताप सिंह जी के पास एक सबसे प्रिय घोड़ा था,
जिसका नाम 'चेतक' था।
राजपूत शिरोमणि महाराणा प्रतापसिंह उदयपुर,
मेवाड़ में सिसोदिया राजवंश के राजा थे।
वह तिथि धन्य है, जब मेवाड़ की शौर्य-भूमि पर मेवाड़-मुकुटमणि
राणा प्रताप का जन्म हुआ।
महाराणा का नाम
इतिहास में वीरता और दृढ़ प्रण के लिये अमर है।
महाराणा प्रताप की जयंती विक्रमी सम्वत् कॅलण्डर
के अनुसार प्रतिवर्ष ज्येष्ठ, शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाई जाती
है।
महाराणा प्रताप के बारे में कुछ रोचक जानकारी:-
1... महाराणा प्रताप एक ही झटके में घोड़े समेत दुश्मन सैनिक को काट डालते थे।
2.... जब इब्राहिम लिंकन भारत दौरे पर आ रहे थे तब उन्होने
अपनी माँ से पूछा कि हिंदुस्तान से आपके लिए क्या लेकर
आए| तब माँ का जवाब मिला- ”उस महान देश की वीर भूमि
हल्दी घाटी से एक मुट्ठी धूल लेकर आना जहाँ का राजा अपनी प्रजा के प्रति इतना वफ़ादार था कि उसने आधे हिंदुस्तान के बदले अपनी मातृभूमि को चुना ” लेकिन बदकिस्मती से उनका वो दौरा रद्द हो गया था | “बुक ऑफ़
प्रेसिडेंट यु एस ए ‘किताब में आप यह बात पढ़ सकते हैं |
3.... महाराणा प्रताप के भाले का वजन 80 किलोग्राम था और कवच का वजन भी 80 किलोग्राम ही था|
कवच, भाला, ढाल, और हाथ में तलवार का वजन मिलाएं तो कुल वजन 207 किलो था।
4.... आज भी महाराणा प्रताप की तलवार कवच आदि सामान
उदयपुर राज घराने के संग्रहालय में सुरक्षित हैं |
5.... अकबर ने कहा था कि अगर राणा प्रताप मेरे सामने झुकते है तो आधा हिंदुस्तान के वारिस वो होंगे पर बादशाहत अकबर की ही रहेगी|
लेकिन महाराणा प्रताप ने किसी की भी अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया |
6.... हल्दी घाटी की लड़ाई में मेवाड़ से 20000 सैनिक थे और
अकबर की ओर से 85000 सैनिक युद्ध में सम्मिलित हुए |
7.... महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक का मंदिर भी बना हुआ है जो आज भी हल्दी घाटी में सुरक्षित है |
8.... महाराणा प्रताप ने जब महलों का त्याग किया तब उनके साथ लुहार जाति के हजारो लोगों ने भी घर छोड़ा और दिन रात राणा कि फौज के लिए तलवारें बनाईं| इसी
समाज को आज गुजरात मध्यप्रदेश और राजस्थान में गाढ़िया लोहार कहा जाता है|
मैं नमन करता हूँ ऐसे लोगो को |
9.... हल्दी घाटी के युद्ध के 300 साल बाद भी वहाँ जमीनों में तलवारें पाई गई।
आखिरी बार तलवारों का जखीरा 1985 में हल्दी घाटी में मिला था |
10..... महाराणा प्रताप को शस्त्रास्त्र की शिक्षा "श्री जैमल मेड़तिया जी" ने दी थी जो 8000 राजपूत वीरों को लेकर 60000 मुसलमानों से लड़े थे। उस युद्ध में 48000 मारे गए थे
जिनमे 8000 राजपूत और 40000 मुग़ल थे |
11.... महाराणा के देहांत पर अकबर भी रो पड़ा था |
12.... मेवाड़ के आदिवासी भील समाज ने हल्दी घाटी में
अकबर की फौज को अपने तीरो से रौंद डाला था वो महाराणा प्रताप को अपना बेटा मानते थे और राणा बिना भेदभाव के उन के साथ रहते थे|
आज भी मेवाड़ के राजचिन्ह पर एक तरफ राजपूत हैं तो दूसरी तरफ भील |
13..... महाराणा प्रताप का घोड़ा चेतक महाराणा को 26 फीट का दरिया पार करने के बाद वीर गति को प्राप्त हुआ | उसकी एक टांग टूटने के बाद भी वह दरिया पार कर गया। जहाँ वो घायल हुआ वहां आज खोड़ी इमली नाम का पेड़ है जहाँ पर चेतक की मृत्यु हुई वहाँ चेतक मंदिर है |
14..... राणा का घोड़ा चेतक भी बहुत ताकतवर था उसके
मुँह के आगे दुश्मन के हाथियों को भ्रमित करने के लिए हाथी
की सूंड लगाई जाती थी । यह हेतक और चेतक नाम के दो घोड़े थे|
15..... मरने से पहले महाराणा प्रताप ने अपना खोया
हुआ 85 % मेवाड फिर से जीत लिया था । सोने चांदी और
महलो को छोड़कर वो 20 साल मेवाड़ के जंगलो में घूमे |
16.... महाराणा प्रताप का वजन 110 किलो और लम्बाई 7’5” थी, दो म्यान वाली तलवार और 80 किलो का भाला रखते थे हाथ में।
महाराणा प्रताप के हाथी
की कहानी:
मित्रो आप सब ने महाराणा
प्रताप के घोड़े चेतक के बारे
में तो सुना ही होगा,
लेकिन उनका एक हाथी
भी था। जिसका नाम था रामप्रसाद। उसके बारे में आपको कुछ बाते बताता हुँ।
रामप्रसाद हाथी का उल्लेख
अल- बदायुनी, जो मुगलों
की ओर से हल्दीघाटी के
युद्ध में लड़ा था ने अपने एक ग्रन्थ में किया है।
वो लिखता है की जब महाराणा
प्रताप पर अकबर ने चढाई की
थी तब उसने दो चीजो को
ही बंदी बनाने की मांग की
थी एक तो खुद महाराणा
और दूसरा उनका हाथी
रामप्रसाद।
आगे अल बदायुनी लिखता है
की वो हाथी इतना समझदार
व ताकतवर था की उसने
हल्दीघाटी के युद्ध में अकेले ही
अकबर के 13 हाथियों को मार
गिराया था
वो आगे लिखता है कि
उस हाथी को पकड़ने के लिए
हमने 7 बड़े हाथियों का एक
चक्रव्यूह बनाया और उन पर
14 महावतो को बिठाया तब
कहीं जाकर उसे बंदी बना पाये।
अब सुनिए एक भारतीय
जानवर की स्वामी भक्ति।
उस हाथी को अकबर के समक्ष
पेश किया गया जहा अकबर ने
उसका नाम पीरप्रसाद रखा।
रामप्रसाद को मुगलों ने गन्ने
और पानी दिया।
पर उस स्वामिभक्त हाथी ने
18 दिन तक मुगलों का न
तो दाना खाया और न ही
पानी पिया और वो शहीद
हो गया।
तब अकबर ने कहा था कि
जिसके हाथी को मैं अपने सामने
नहीं झुका पाया उस महाराणा
प्रताप को क्या झुका पाउँगा।
ऐसे ऐसे देशभक्त चेतक व रामप्रसाद जैसे तो यहाँ
जानवर थे।
इसलिए मित्रो हमेशा अपने
भारतीय होने पे गर्व करो।
जय हिन्द जय भारत।
Wednesday, 9 December 2015
सारनाथ /Sarnath
सारनाथ / Sarnath
सारनाथ काशी से सात मील पूर्वोत्तर में स्थित बौद्धों का प्राचीन तीर्थ है, ज्ञान प्राप्त करने के बाद भगवान बुद्ध ने प्रथम उपदेश यहाँ दिया था, यहाँ से ही उन्होंने "धर्म चक्र प्रवर्तन" प्रारम्भ किया, यहाँ पर सारंगनाथ महादेव का मन्दिर है, यहाँ सावन के महीने में हिन्दुओं का मेला लगता है। यह जैन तीर्थ है और जैन ग्रन्थों में इसे सिंहपुर बताया है। सारनाथ की दर्शनीय वस्तुयें-अशोक का चतुर्मुख सिंहस्तम्भ, भगवान बुद्ध का मन्दिर, धामेख स्तूप, चौखन्डी स्तूप, राजकीय संग्राहलय, जैन मन्दिर, चीनी मन्दिर, मूलंगधकुटी और नवीन विहार हैं, मुहम्मद गौरी ने इसे लगभग ख़त्म कर दिया था, सन 1905 में पुरातत्व विभाग ने यहाँ खुदाई का काम किया, उस समय बौद्ध धर्म के अनुयायों और इतिहासवेत्ताओं का ध्यान इस पर गया।
1 सारनाथ
काशी अथवा वाराणसी से लगभग 10 कि.मी. दूर स्थित सारनाथ प्रसिद्ध बौद्ध तीर्थ है। पहले यहाँ घना वन था और मृग-विहार किया करते थे। उस समय इसका नाम 'ऋषिपत्तन मृगदाय' था। ज्ञान प्राप्त करने के बाद गौतम बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश यहीं पर दिया था। सम्राट अशोक के समय में यहाँ बहुत से निर्माण-कार्य हुए। शेरों की मूर्ति वाला भारत का राजचिह्न सारनाथ के अशोक के स्तंभ के शीर्ष से ही लिया गया है। यहाँ का 'धमेक स्तूप' सारनाथ की प्राचीनता का आज भी बोध कराता है। विदेशी आक्रमणों और परस्पर की धार्मिक खींचातानी के कारण आगे चलकर सारनाथ का महत्व कम हो गया था। मृगदाय में सारंगनाथ महादेव की मूर्ति की स्थापना हुई और स्थान का नाम सारनाथ पड़ गया।
ऐतिहासिक तथ्य
इतिहास-प्रसिद्ध स्थान है जो गौतम बुद्ध के प्रथम धर्मप्रवचन (धर्मचक्रप्रवर्तन) के लिए जगद्विख्यात है। बौद्धकाल में इसे ऋषिपत्तन (पाली-इसीपत्तन) भी कहते थे क्योंकि ज्ञान-विज्ञान के केंद्र काशी के निकट होने के कारण यहाँ भी ऋषि-मुनि निवास करते थे। ऋषिपट्टन के निकट ही मृगदाव नामक मृगों के रहने का वन था। जिसका संबंध बोधिसत्व की एक कथा से भी जोड़ा जाता है। वोधिसत्व ने अपने किसी पूर्वजन्म में, जब वे मृगदाव में मृगों के राजा थे, अपने प्राणों की बलि देकर एक गर्भवती हरिणी की जान बचाई थी। इसी कारण इस वन को सार-या सारंग (मृग)- नाथ कहने लगे। रायबहादुर दयाराम साहनी के अनुसार शिव को भी पौराणिक साहित्य में सारंगनाथ कहा गया है और महादेव शिव की नगरी काशी की समीपता के कारण यह स्थान शिवोपासना की भी स्थली बन गया। इस तथ्य की पुष्टि सारनाथ में, सारनाथ नामक शिवमंदिर की वर्तमानता से होती है।
एक स्थानीय किंवदंती के अनुसार बौद्ध धर्म के प्रचार के पूर्व सारनाथ शिवोपासना का केंद्र था। किंतु , जैसे गया आदि और भी कई स्थानों के इतिहास से प्रमाणित होता है बात इसकी उल्टी भी हो सकती है, अर्थात बौद्ध धर्म के पतन के पश्चात ही शिव की उपासना यहाँ प्रचलित हुई हो। जान पड़ता है कि जैसे कई प्राचीन विशाल नगरों के उपनगर या नगरोद्यान थे (जैसे प्राचीन विदिशा का साँची, अयोध्या का साकेत आदि) उसी प्रकार सारनाथ में मूलत: ऋषियों या तपस्वियों के आश्रम स्थित थे जो उन्होंने काशी के कोलाहल से बचने के लिए, किंतु फिर भी महान नगरी के सान्निध्य में, रहने के लिए बनाए थे।
प्रमाण
गौतमबुद्ध गया में संबुद्धि प्राप्त करने के अनंतर यहाँ आए थे और उन्होंने कौडिन्य आदि अपने पूर्व साथियों को प्रथम बार प्रवचन सुनाकर अपने नये मत में दीक्षित किया था। इसी प्रथम प्रवचन को उन्होंने धर्मचक्रप्रवर्तन कहा जो कालांतर में, भारतीय मूर्तिकला के क्षेत्र में सारनाथ का प्रतीक माना गया। बुद्ध ही के जीवनकाल में काशी के श्रेष्टी नंदी ने ऋषिपत्तन में एक बौद्ध विहार बनवाया था। [1]
तीसरी शती ई॰पू॰ में अशोक ने सारनाथ की यात्रा की और यहाँ कई स्तूप और एक सुंदर प्रस्तरस्तंभ स्थापित किया जिस पर मौर्य सम्राट की एक धर्मलिपि अंकित है। इसी स्तंभ का सिंह शीर्ष तथा धर्मचक्र भारतीय गणराज्य का राजचिह्न बनाया गया है। चौथी शती ई॰ में चीनी यात्री फ़ाह्यान इस स्थान पर आया था। उसने सारनाथ में चार बड़े स्तूप और पांच विहार देखे थे।
6ठी शती ई॰ में हूणों ने इस स्थान पर आक्रमण करके यहाँ के प्राचीन स्मारकों को घोर क्षति पहुंचाई। इनका सेनानायक मिहिरकुल था।
7वीं शती ई॰ के पूर्वार्ध में, प्रसिद्ध चीनी यात्री युवानच्वांग ने वाराणसी और सारनाथ की यात्रा की थी। उस समय यहाँ 30 बौद्ध विहार थे जिनमें 1500 थेरावादी भिक्षु निवास करते थे।
युवानच्वांग ने सारनाथ में 100 हिंदू देवालय भी देखें थे जो बौद्ध धर्म के धीरे-धीरे पतनोन्मुख होने तथा प्राचीन धर्म के पुनरोत्कर्ष के परिचायक थे।
11वीं शती में महमूद ग़ज़नवी ने सारनाथ पर आक्रमण किया और यहाँ के स्मारकों को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया।
तत्पश्चात 1194 ई॰ में मुहम्मद गौरी के सेनापति कुतुबुद्दीन ने तो यहाँ की बचीखुची प्राय: सभी इमारतों तथा कलाकृतियों को लगभग समाप्त ही कर दिया। केवल दो विशाल स्तूप ही छ: शतियों तक अपने स्थान पर खड़े रहे।
1794 ई॰ में काशी-नरेश चेतसिंह के दीवान जगतसिंह ने जगतगंज नामक वाराणसी के मुहल्ले को बनवाने के लिए एक स्तूप की सामग्री काम में ले ली। यह स्तूप ईटों का बना था। इसका व्यास 110 फुट था। कुछ विद्वानों का कथन है कि यह अशोक द्वारा निर्मित धर्मराजिक नामक स्तूप था। जगतसिंह ने इस स्तूप का जो उत्खनन करवाया था उसमे इस विशाल स्तूप के अंदर से बलुवा पत्थर और संगमरमर के दो बर्तन मिले थे जिनमें बुद्ध के अस्थि-अवशेष पाए गए थे। इन्हें गंगा में प्रवाहित कर दिया गया।
पुरातत्तव विभाग द्वारा यहाँ जो उत्खनन किया गया उसमें 12वीं शती ई॰ में यहाँ होने वाले विनाश के अध्ययन से ज्ञात होता है कि यहाँ के निवासी मुसलमानों के आक्रमण के समय एकाएक ही भाग निकले थे क्योंकि विहारों की कई कोठरियों में मिट्टी के बर्तनों में पकी दाल और चावल के अवशेष मिले थे। 1854 ई॰ में भारत सरकार ने सारनाथ को एक नील के व्यवसायी फर्ग्युसन से ख़रीद लिया। लंका के अनागरिक धर्मपाल के प्रयत्नों से यहाँ मूलगंधकुटी विहार नामक बौद्ध मंदिर बना था। सारनाथ के अवशिष्ट प्राचीन स्मारकों में निम्न स्तूप उल्लेखनीय हैं- चौखंडी स्तूप इस पर मुग़ल सम्राट् अकबर द्वारा अंकित 1588 ई॰ का एक फारसी अभिलेख ख़ुदा है जिसमें हुमायूँ के इस स्थान पर आकर विश्राम करने का उल्लेख है। [2]; धमेख अथवा धर्ममुख स्तूप-पुरातत्त्व विद्वानों के मतानुसार यह स्तूप गुप्तकालीन है और भावी बुद्ध मैत्रेय के सम्मानार्थ बनवाया गया था। किंवदंती है कि यह वही स्थल है जहां मैत्रेय को गौतम बुद्ध ने उसके भावी बुद्ध बनने के विषय में भविष्यवाणी की थी। [3] ख़ुदाइर में इसी स्तूप के पास अनेक खरल आदि मिले थे जिससे संभावना होती है कि किसी समय यहाँ औषधालय रहा होगा। इस स्तूप में से अनेक सुंदर पत्थर निकले थे।
कलाकृतियां तथा प्रतिमाएं
सारनाथ के क्षेत्र की ख़ुदाई से गुप्तकालीन अनेक कलाकृतियां तथा बुद्ध प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं जो वर्तमान संग्रहालय में सुरक्षित हैं। गुप्तकाल में सारनाथ की मूर्तिकला की एक अलग ही शैली प्रचलित थी, जो बुद्ध की मूर्तियों के आत्मिक सौंदर्य तथा शारीरिक सौष्ठव की सम्मिश्रित भावयोजना के लिए भारतीय मूर्तिकला के इतिहास में प्रसिद्ध है। सारनाथ में एक प्राचीन शिव मंदिर तथा एक जैन मंदिर भी स्थित हैं। जैन मंदिर 1824 ई॰ में बना था; इसमें श्रियांशदेव की प्रतिमा है। जैन किंवदंती है कि ये तीर्थंकर सारनाथ से लगभग दो मील दूर स्थित सिंह नामक ग्राम में तीर्थंकर भाव को प्राप्त हुए थे। सारनाथ से कई महत्त्वपूर्ण अभिलेख भी मिले हैं जिनमें प्रमुख काशीराज प्रकटादित्य का शिलालेख है। इसमें बालादित्य नरेश का उल्लेख है जो फ्लीट के मत में वही बालादित्य है जो मिहिरकुल हूण के साथ वीरतापूर्वक लड़ा था। यह अभिलेख शायद 7वीं शती के पूर्व का है। दूसरे अभिलेख में हरिगुप्त नामक एक साधु द्वारा मूर्तिदान का उल्लेख है। यह अभिलेख 8वीं शती ई॰ का जान पड़ता है।
बीच में लोग इसे भूल गए थे। यहाँ के ईट-पत्थरों को निकालकर वाराणसी का एक मुहल्ला ही बस गया। 1905 ई॰ में जब पुरातत्व विभाग ने ख़ुदाई आरंभ की तब सारनाथ का जीर्णोद्धार हुआ। अब यहाँ संग्रहालय है, 'मूलगंध कुटी विहार' नामक नया मंदिर बन चुका है, बोधिवृक्ष की शाखा लगाई गई है और प्राचीन काल के मृगदाय का स्मरण दिलाने के लिए हरे-भरे उद्यानों में कुछ हिरन भी छोड़ दिए गए हैं। संसार भर के बौद्ध तथा अन्य पर्यटक यहाँ आते रहते हैं।