आपरेशन ब्लू स्टार भारतीय सेना द्वारा 3 से 6 जून 1984 को अमृतसर (पंजाब, भारत) स्थित
हरिमंदिर साहिब परिसर को खालिस्तान समर्थक जनरैल सिंह भिंडरावाले और उनके समर्थकों से मुक्त कराने के लिए चलाया गया अभियान था। पंजाब में भिंडरावाले के नेतृत्व में अलगाववादी ताकतें सशक्त हो रही थीं जिन्हें पाकिस्तान से समर्थन मिल रहा था।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
पंजाब समस्या की शुरुआत 1970 के दशक से अकाली राजनीति में खींचतान और अकालियों की पंजाब संबंधित माँगों के रूप में हुई थी। 1973 और 1978 ई. में अकाली दल ने आनंदपुर साहिब प्रस्ताव पारित किया। मूल प्रस्ताव में सुझाया गया था कि भारत की केंद्र सरकार का केवल रक्षा, विदेश नीति, संचार और मुद्रा पर अधिकार हो जबकि अन्य विषयों पर राज्यों को पूर्ण अधिकार हों. वे भारत के उत्तरी क्षेत्र में स्वायत्तता चाहते थे। उनकी माँग थी कि- चंडीगढ़ केवल पंजाब की ही राजधानी हो, पंजाबी भाषी क्षेत्र पंजाब में शामिल किए जाएँ, नदियों के पानी के मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय की राय ली जाए, 'नहरों के हेडवर्क्स' और पन-बिजली बनाने के मूलभूत ढाँचे का प्रबंधन पंजाब के पास हो, फ़ौज में भर्ती काबिलियत के आधार पर हो और इसमें सिखों की भर्ती पर लगी कथित सीमा हटाई जाए, तथा अखिल भारतीय गुरुद्वारा क़ानून बनाया जाए. अकालियों का समर्थन और प्रभाव बढ़ने लगा। इसी बीच अमृतसर में 13 अप्रैल 1978 को अकाली कार्यकर्ताओं और निरंकारियों के बीच हिंसक झड़प हुई। इसमें 13 अकाली कार्यकर्ता मारे गए। रोष दिवस में सिख धर्म प्रचार की संस्था के प्रमुख जरनैल सिंह भिंडरांवाले ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। अनेक पर्यवेक्षक इस घटना को पंजाब में चरमपंथ की शुरुआत के रूप में देखते हैं। भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी पर सिख समुदाय में अकाली दल के जनाधार को घटाने के लिए जरनैल सिंह भिंडरांवाले को परोक्ष रूप से प्रोत्साहन देने का आरोप लगाया जाता है।
अकाली दल भारत की राजनीतिक मुख्यधारा में रहकर पंजाब और सिखों की माँगों की बात कर रहा था लेकिन उसका रवैया ढुलमुल माना जाता था। जरनैल सिंह भिंडरांवाले ने इनपर कड़ा रुख़ अपनाया और केंद्र सरकार को दोषी ठहराना शुरु किया। वे विवादास्पद राजनीतिक मुद्दों और धर्म और उसकी मर्यादा पर नियमित तौर पर भाषण देने लगे। उन्हें एक तबके का समर्थन भी मिलने लगा।
पंजाब में हिंसक घटनाएँ बढ़ने लगी। सितंबर 1981 में हिंद समाचार - पंजाब केसरी अख़बार समूह के संपादक लाला जगत नारायण की हत्या कर दी गई। जालंधर, तरन तारन, अमृतसर, फ़रीदकोट और गुरदासपुर में हुई हिंसक घटनाओं में कई जानें गईं। भिंडरांवाले पर हिंसक गतिविधियों को बढ़ावा देने के आरोप लगे। पुलिस पर्याप्त सबूत नहीं होने की बात कहकर उनके खिलाफ कार्यवाई करने से बचती रही।
सितंबर १९८१ में भिंडरांवाले के महता चौक गुरुद्वारे के सामने गिरफ़्तार होने पर वहाँ एकत्र
भीड़ और पुलिस के बीच गोलीबारी हुई और ग्यारह व्यक्तियों की मौत हो गई। पंजाब में हिंसा का दौर शुरु हो गया। कुछ ही दिन बाद सिख छात्र संघ के सदस्यों ने एयर इंडिया के विमान का अपहरण कर लिया।
भिंडरांवाले को जनसमर्थन मिलता देख अकाली दल के नेता भी उनके समर्थन में बयान देने लगे। १९८२ ई. में भिंडरांवाले चौक महता गुरुद्वारा छोड़ पहले स्वर्ण मंदिर परिसर में गुरु नानक निवास और इसके कुछ महीने बाद सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था अकाल तख्त से अपने विचार व्यक्त करने लगे। अकाली दल ने सतलुज-यमुना लिंक नहर बनाने के ख़िलाफ़ जुलाई 1982 में अपना 'नहर रोको मोर्चा' छेड़ रखा था जिसके तहत अकाली कार्यकर्ता लगातार गिरफ़्तारियाँ दे रहे थे। इसी बीच स्वर्ण मंदिर परिसर से भिंडरांवाले ने अपने साथी अखिल भारतीय सिख छात्र संघ के प्रमुख अमरीक सिंह की रिहाई के लिए नया अभियान शुरु किया। अकालियों ने अपने मोर्चे का भिंडरांवाले के मोर्चे में विलय कर दिया और धर्म युद्ध मोर्चे के तहत गिरफ़्तारियाँ देने लगे।
हिंसक घटनाएं और बढ़ीं। पटियाला के पुलिस उपमहानिरीक्षक के दफ़्तर में बम विस्फोट हुआ। पंजाब के उस समय के मुख्यमंत्री दरबारा सिंह पर भी हमला हुआ। अप्रैल १९८३ में पंजाब पुलिस के उपमहानिरीक्षक एएस अटवाल की दिन दहाड़े हरिमंदिर साहब परिसर में गोली मार दी गई। पुलिस का मनोबल गिरता चला गया। कुछ महीने बाद पंजाब रोडवेज़ की एक बस में घुसे बंदूकधारियों ने जालंधर के पास कई हिंदुओं को मार डाला।
इंदिरा गाँधी सरकार ने पंजाब में दरबारा सिंह की काँग्रेस सरकार को बर्खास्त कर दिया और राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया। लेकिन पंजाब की स्थिति बिगड़ती गई। मार्च १९८४ तक हिंसक घटनाओं में २९८ लोग मारे जा चुके थे। इंदिरा गाँधी सरकार की अकाली नेताओं के साथ तीन बार बातचीत हुई. आख़िरी चरण की बातचीत फ़रवरी १९८४ में तब टूट गई जब हरियाणा में सिखों के ख़िलाफ़ हिंसा हुई. १ जून को भी स्वर्ण मंदिर परिसर और उसके बाहर तैनात केंद्रीय रिज़र्व आरक्षी बल के बीच गोलीबारी हुई।
भिंडरावाले को ऐसा लग रहा था कि, उनके नेतृत्व में पंजाब अपना एक अलग अस्तित्व बना लेगा। यह काम वह हथियारों के बल पर कर सकता है। इसमें उसे पाकिस्तान से सहयोग का भरोसा था। उसने पाकिस्तान की सीमा के निकट स्थित अमृतसर के सिक्खों के सर्वोच्च मंदिर को अपने अभियान के लिए किले के रूप में प्रयुक्त करने की योजना बनायी। संत जरनैल सिंह, कोर्ट मार्शल किए गए मेजर जनरल सुभेग सिंह और सिख सटूडेंट्स फ़ेडरेशन ने स्वर्ण मंदिर परिसर के चारों तरफ़ ख़ासी मोर्चाबंदी कर ली थी। उन्होंने भारी मात्रा में आधुनिक हथियार औ्र गोला-बारूद भी जमा कर लिया था। 1985 ई. में होने वाले आम चुनाव से ठीक पहले इंदिरा गाँधी इस समस्या को सुलझाना चाहती थीं। अंततः उन्होंने सिक्खों की धार्मिक भावनाएं आहत करने के जोखिम को उठाकर भी इस समस्या का अंत करने का निश्चय किया औ्र सेना को ऑपरेशन ब्लू स्टार करने का आदेश दिया।
तात्कालिक स्थिति
दो जून को हर मंदिर साहिब परिसर में हज़ारों श्रद्धालुओं ने आना शुरु कर दिया था क्योंकि तीन जून को गुरु अरजुन देव का शहीदी दिवस था। उधर जब प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने देश को संबोधित किया तो ये स्पष्ट था कि सरकार स्थिति को ख़ासी गंभीरता से देख रही है और भारत सरकार कोई भी कार्रवाई कर सकती है। पंजाब से आने-जाने वाली रेलगाड़ियों और बस सेवाओं पर रोक लग गई, फ़ोन कनेक्शन काट दिए गए और विदेशी मीडिया को राज्य से बाहर कर दिया गया।
भारतीय सैन्य अभियान
तीन जून को भारतीय सेना ने अमृतसर पहुँचकर स्वर्ण मंदिर परिसर को घेर लिया। शाम में शहर में कर्फ़्यू लगा दिया गया। चार जून को सेना ने गोलीबारी शुरु कर दी ताकि मंदिर में मौजूद मोर्चाबंद चरमपंथियों के हथियारों और असले का अंदाज़ा लगाया जा सके। चरमपंथियों की ओर से इसका इतना तीखा जवाब मिला कि पांच जून को बख़तरबंद गाड़ियों और टैंकों को इस्तेमाल करने का निर्णय किया गया। पांच जून की रात को सेना और सिख लड़ाकों के बीच असली भिड़ंत शुरु हुई.
क्षति
भीषण ख़ून-ख़राबा हुआ। अकाल तख़्त पूरी तरह तबाह हो गया। स्वर्ण मंदिर पर भी गोलियाँ चलीं। कई सदियों में पहली बार वहाँ से पाठ छह, सात और आठ जून को नहीं हो पाया। ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण सिख पुस्तकालय जल गया।
भारत सरकार के श्वेतपत्र के अनुसार 83 सैनिक मारे गए और 249 घायल हुए। 493 चरमपंथी या आम नागरिक मारे गए, 86 घायल हुए और 1592 को गिरफ़्तार किया गया। लेकिन ये आंकड़े विवादित माने जाते हैं।
धार्मिक प्रभाव
इस कार्रवाई से सिख समुदाय की भावनाओं को बहुत ठेस पहुँची। स्वर्ण मंदिर पर हमला करने को बहुत से सिक्खों ने अपने धर्म पर हमला करने के समान माना। कई प्रमुख सिखों ने या तो अपने पदों से इस्तीफ़ा दे दिया या फिर सरकार द्वारा दिए गए सम्मान लौटा दिए.
राजनीतिक प्रभाव
सिखों और काँग्रेस पार्टी के बीच दरार पैदा हो गई जो उस समय और गहरा गई जब दो सिख सुरक्षाकर्मियों ने कुछ ही महीने बाद 31 अक्टूबर को तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या कर दी. इसके बाद भड़के सिख विरोधी दंगों से काँग्रेस और सिखों की बीच की खाई और बड़ी हो गई।
इंदिरा गाँधी की हत्या
ऑपरेशन ब्लू स्टार के कारण आहत सिखो की धार्मिक भावनाओं का दुष्परिणाम 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गाँधी की नृशंस हत्या के रूप में सामने आया। उनके ही दो सिक्ख सुरक्षा प्रहरियों ने उन्हें गोलियों से छलनी कर दिया। इंदिरा गाँधी की मौके पर ही मृत्यु हो गई थी। लेकिन अपराह्न 3 बजे के आस-पास उनकी मृत्यु की सूचना प्रसारित की गई।
ऑपरेशन ब्लू स्टार: अहम तारीख
1973- आनंदपुर साहिब प्रस्ताव पारित। प्रस्ताव में केंद्र को विदेश मामलों, मुद्रा, रक्षा और संचार सहित केवल पाँच दायित्व अपने पास रखते हुए बाकी के अधिकार राज्य को देने और पंजाब को एक स्वायत्त राज्य के रूप में स्वीकारने संबंधी बातें कही गईं थी।
1977- जरनैल सिंह भिंडरावाले सिखों की धार्मिक प्रचार की प्रमुख शाखा, दमदमी टकसाल के प्रमुख चुने गए और अमृत प्रचार अभियान की शुरुआत की।
१९७८- अखंड कीर्तनी जत्थे, दमदमी टकसाल और निरंकारी सिखों के बीच अमृतसर में संघर्ष, 13 सिखों की मौत। अकाल तख़्त साहिब ने सिखों के संत निरंकारी पंथ के ख़िलाफ़ हुक़्मनामा जारी किया। लुधियाना में 18वीं अखिल भारतीय अकाली सम्मेलन का आयोजन जिसमें अनंदपुर साहिब प्रस्ताव पर एक लचीला रुख अपनाते हुए दूसरा प्रस्ताव पारित किया गया।
१९७९-अकाली दल का दो धड़ों में विभाजन, पहले धड़े का नेतृत्व हरचंद सिंह लोंगवाल और प्रकाश सिंह बादल संभालते हैं जबकि दूसरे धड़े का नेतृत्व जगदेव सिंह तलवंडी और तत्कालीन एसजीपीसी अध्यक्ष गुरचरण सिंह तोहड़ा
१९८०- निरंकारी पंथ के प्रमुख गुरबचन सिंह पर छठा जानलेवा हमला, उस समय वे दिल्ली स्थित अपने मुख्यालय आ रहे थे। इस हमले में उनकी मौत हो गई थी।
१९८१- एक नए स्वायत्त खालिस्तान का झंडा पंजाब स्थित आनंदपुर साहिब पर फहराया गया। हिंद समाचार समूह के प्रमुख जगत नारायण की हत्या मामले में जरनैल सिंह भिंडरावाले ने आत्मसमर्पण किया। उन्हें हिरासत में लेकर जेल भेज दिया गया। भिंडरावाले अपने मक़सद के लिए हिंसा का रास्ता अपनाने को सही मानते थे। इसी महीने दल खालसा के गजिंदर सिंह और सतनाम सिंह पौंटा सहित पांच सदस्य श्रीनगर से दिल्ली आ रहे इंडियन एयरलाइंस के विमान को हाईजैक कर लाहौर ले गए। अपहर्ताओं ने नकद रक़म और भिंडरावाले को जेल से रिहा करने की मांग रखी। जरनैल सिंह भिंडरावाले जेल से रिहा कर दिए गए। इसी महीने शिरोमणि अकाली दल और दिल्ली की केंद्र सरकार के बीच पहले दौर की बातचीत हुई, जिसमें शिरोमणि अकाली दल ने लचीला रुख अपनाकर अपनी मांगों को 45 से घटाकर 15 कर दिया। इनमें एक अहम थी भिंडरावाले की बिना शर्त रिहाई।
१९८२- शिरोमणि अकाली दल और केंद्र सरकार के बीच तीसरे दौर की बातचीत। इस बातचीत को अकाली दल ने विफल बताया था।|शिरोमणि अकाली दल अपने विरोध को आगे बढ़ाते हुए यमुना-सतलुज परियोजना का ज़ोरदार विरोध करने का फ़ैसला किया और नहर रोको मोर्चा खोल दिया। | भिंडरावाले अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर परिसर में गुरुनानक निवास के कमरा नंबर 47 में आ जाते हैं। |अकाली दल ने धर्म युद्ध मोर्चा की घोषणा की |दिल्ली से श्रीनगर जा रहे एक 126 यात्रियों वाले इंडियन एअरलाइंस के विमान को हाईजैक कर लाहौर में उतारने की कोशिश की गई, लेकिन लाहौर से इसकी इजाज़त नहीं मिली। इसके बाद विमान को अमृतसर में उतारा गया। अपहर्ता को अमृतसर में गिरफ़्तार कर लिया गया। इसी महीने इंडियन एअरलाइंस के एक और विमान को जोधपुर के रास्ते मुंबई से दिल्ली आते वक़्त हाईजैक कर लिया गया। इस विमान को भी लाहौर में उतरने की अनुमति नहीं मिली। इसके बाद अपहर्ता ने विमान को अमृतसर में उतारा। अमृतसर हवाई अड्डे पर कमांडो कार्रवाई में सिख अपहर्ता मुसीबत सिंह की मौत। |दिल्ली में नौवें एशियाई खेलों के आयोजन के दौरान अकाली दल ने विरोध की अपील की। कई सिख राजधानी में दाखिल होने की कोशिश करते पकड़े गए। कुछ को प्रताड़ित किया गया। सिखों के उत्पीड़न के मामले मुख्य रूप से हरियाणा से सामने आए।
१९८३- पंजाब पुलिस के डीआईजी अवतार सिंह अटवाल की अमृतसर में स्वर्ण मंदिर के ठीक सामने हत्या कर दी गई। | अकाली दल ने रेल रोको और काम रोको मोर्चा खोला। इससे आम जनजीवन और रेल यातायात बुरी तरह प्रभावित हुआ। |दरबारा सिंह के नेतृत्व वाली पंजाब की कांग्रेस सरकार को भंग कर राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया। |भिंडरावाले अब अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर के गुरु नानक निवास से परिसर के सबसे अहम हिस्से यानी अकाल तख़्त साहिब में पहुंच गए थे।
१९८४- पंजाबी के सर्वाधिक पढ़े जाने वाली मासिक पत्रिका, ‘प्रीतलारी’ के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार सुमित सिंह शम्मी की हत्या कर दी गई। |पूर्व विधायक और अमृतसर में भाजपा प्रमुख हरबंस लाल खन्ना की उनके अंगरक्षक समेत गोली मारकर हत्या। अगले दिन उनकी शवयात्रा में हिंसा भड़क गई। इसमें आठ लोग मारे गए और नौ घायल हुए थे।| हिंदू ब्राह्मण परिवार से आने वाले पंजाबी भाषा के प्रोफ़ेसर विश्वनाथ तिवारी की उनकी पत्नी समेत हत्या कर दी गई। प्रोफ़ेसर तिवारी की पत्नी पंजाबी थीं। दोनों गुटों, लोगंवाल और भिंडरावाले ने पर्चे बांटकर एक-दूसरे पर सिख संप्रदाय के नीचे गिरने का कारण बनने के आरोप लगाए। | हिंद समाचार समूह के संपादक जगत नारायण की हत्या के बाद उनके बेटे रमेश चंद्र ने ज़िम्मेदारी संभाली थे उनकी भी जालंधर स्थित उनके कार्यालय में हत्या कर दी |अमृतसर स्थित दरबार साहिब यानी स्वर्ण मंदिर परिसर में भारतीय सेना ने प्रवेश किया। सेना ने स्वर्ण मंदिर को चारों ओर से घेर लिया। भारी गोलाबारी और संघर्ष में सैकड़ों लोगों की मौत हुई। मंदिर परिसर भी क्षतिग्रस्त। इस हमले में भिंडरावाले और लेफ्टिनेंट जनरल शहबेग सिंह सहित कई प्रमुख लोगों की मौत। इस अभियान को ऑपरेशन ब्लू स्टार का नाम दिया |देश के कई हिस्सों में सिख सैनिकों के विद्रोह की ख़बरें आती हैं। सिख रेजीमेंट के क़रीब 500 सैनिकों ने राजस्थान के गंगानगर ज़िले में ऑपरेशन ब्लू स्टार की ख़बरें सुनकर बग़ावत कर दी थी। बिहार के रामगढ़ अब झारखंड में, अलवर, जम्मू, थाणे और पुणे में सिख सैनिकों ने विद्रोह किया था। रामगढ़ में विद्रोही सैनिकों ने अपने कमांडर, ब्रिगेडियर एससी पुरी की हत्या कर दी थी। | भारत सरकार ने ऑपरेशन ब्लू स्टार पर एक श्वेतपत्र जारी किया, लेकिन उसे आलोचना का सामना करना पड़ा। े|ऑपरेशन ब्लू स्टार के चार महीने बाद ही इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई थी। |तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के दो सिख अंगरक्षकों, सतवंत सिंह और बेअंत सिंह ने उनकी गोली मारकर हत्या कर दी। |इंदिरा गांधी की हत्या के तुरंत बाद देश के कई हिस्सों में सिख विरोधी दंगे भड़के उठे। इन दंगों में हज़ारों लोगों की जान गई।
१९८५- एअर इंडिया की उड़ान संख्या 182 का विमान आयरलैंड के पास नष्ट हो गया। इस हादसे में 329 लोगों की मौत हो गई।| तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और हरचंद सिंह लोंगवाल ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसके बाद चंडीगढ़ पंजाब को मिला| .एक गुरुद्वारे में भाषण देते वक़्त हरचंद सिंह पर हमला कर उनकी हत्या कर दी गई।| अकाली दल को पंजाब में चुनाव में भारी जीत मिली। सुरजीत सिंह बरनाला राज्य के मुख्यमंत्री बने।
१९८६- स्वर्ण मंदिर यानी दरबार साहिब का नियंत्रण एक बार फिर से शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी को सौंप दिया गया
Saturday, 4 June 2016
आपरेशन ब्लू स्टार
Friday, 3 June 2016
उपग्रह क्या है ? { What is the satelite ? }
उपग्रह कुछ इस तरह का नाम है जैसे कि लगता है उपप्रधानमंत्री - इसको समझने का एक तरीका ये है - जैसे प्रधानमंत्री के अंडर में सारे काम काज आते है , और लगभग सांसदों के वोट से उसका चुनाव होता है मगर उपप्रधानमंत्री को चुनने वाला काम प्रधानमंत्री के मुख्य सदस्य हि करतें है , और उसका कार्य जानकारियों को उन सदस्यों तक पहुँचाना होता है -
ठीक उसी प्रकार आप प्रधानमंत्री को ग्रह के रूप में जो कि प्राक्रतिक रूप से बना है - समझ सकते है , और उपग्रह को उपप्रधानमंत्री - जो कि वैज्ञानिक लोग निर्माण करते है - ब्रम्हांड कि जानकारियाँ पाने हेतु समझ सकते है -
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आगे बात करते है वैज्ञानिक द्रष्टि से उपग्रह को समझने की -
उपग्रह को अंग्रेजी भाषा में Satelite कहा जाता है -
किसी ग्रह के चारो ओर परिक्रमा करने वाले पिंड को उस ग्रह का उपग्रह कहते है | चंद्रमा , पृथ्वी का प्राक्रतिक उपग्रह है जबकि INSAT-B , पृथ्वी का कृतिम उपग्रह है |
उपग्रह की कक्षीय चाल कक्षीय त्रिज्या पर निर्भर करती है | पृथ्वी तल के अति निकट चक्कर लगाने वाले उपग्रह की कक्षीय चाल लगभग ७.९ या ८ किमी/ से होती है |
पृथ्वी के अति निकट चक्कर लगाने वाले उपग्रह का परिक्रमण काल ८४ मिनट होता है |
भू-स्थायी उपग्रह पृथ्वी तल से लगभग ३६००० किमी की ऊँचाई पर रहकर पृथ्वी का परिक्रमण करता है | भू-स्थायी उपग्रह पृथ्वी के अक्ष के लम्बवत तल में पश्चिम से पूरब की ओर पृथ्वी की परिक्रमा करता है तथा इसका परिक्रमण काल पृथ्वी के परिक्रमण काल ( २४ घंटे ) के बराबर होता है |
कृत्रिम उपग्रह के अन्दर प्रत्येक वस्तु भारहीनता की स्थिति में होती है |
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उपग्रह से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण तथ्य -
साउंडिंग रॉकेट - इनका कार्य यंत्रों को पृथ्वी के बाह्य वायुमंडल तथा पृथ्वी के नज़दीकी अन्तरिक्ष में ले जाना है | इनमें यंत्रों दवारा ताप और दाब के साथ-साथ अन्तरिक्ष के विकिरणों का भी आंकलन किया जा सकता है |
भू-तुल्यकालिक कक्षा में संचार उपग्रह स्थापित करने की संभावना सबसे पहले आर्थर-सी क्लार्क ने व्यक्त की |
तुल्यकाली उपग्रह का उपयोग रेडियो प्रसारण तथा मौसम सम्बन्धी भविष्यवाणी के लिए किया जाता है |
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Thursday, 2 June 2016
तरकुलहा देवी (Tarkulha Devi) जहाँ चढ़ाई गयी थी कई अंग्रेज सैनिकों कि बलि
तरकुलहा देवी मंदिर (Tarkulha Devi Temple) गोरखपुर से 20 किलो मीटर कि दूरी पर तथा चौरी-चौरा से 5 किलो मीटर कि दुरी पर स्तिथ हैं। तरकुलहा देवी मंदिर (Tarkulha Devi Temple) हिन्दू भक्तो के लिए प्रमुख धार्मिक स्थल हैं।
यह मंदिर अपनी दो विशेषताओ के कारण काफी प्रशिद्ध हैं।
पहला इस मंदिर से जुड़ा क्रांतिकारी बाबू बंधू सिंह(Bandhu singh) का इतिहास :-
यह बात 1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम से पहले की है। इस
इलाके में जंगल हुआ करता था। यहां से से गुर्रा नदी होकर गुजरती थी। इस जंगल में डुमरी
रियासत के बाबू बंधू सिंह (Babu Bandhu Singh) रहा करते थे। नदी के तट पर तरकुल (ताड़) के पेड़ के नीचे पिंडियां
स्थापित कर वह देवी की उपासना किया करते थे। तरकुलहा देवी बाबू बंधू सिंह कि इष्ट देवी थी।
Amar Shahid Bandhu Singh
उन दिनों हर भारतीय का खून अंग्रेजों के जुल्म की कहानियाँ सुन
सुनकर खौल उठता था। जब बंधू सिंह(Bandhu singh) बड़े हुए तो उनके दिल में भी अंग्रेजो के खिलाफ आग जलने लगी। बंधू सिंह(Bandhu singh) गुरिल्ला लड़ाई में माहिर थे, इसलिए जब भी कोई अंग्रेज उस जंगल से गुजरता, बंधू सिंह(Bandhu singh) उसको मार कर उसका सर काटकर देवी मां के
चरणों में समर्पित कर देते ।
पहले तो अंग्रेज यही समझते रहे कि उनके सिपाही जंगल में जाकर
लापता हो जा रहे हैं, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें भी पता लग गया कि अंग्रेज सिपाही बंधू
सिंह के शिकार हो रहे हैं। अंग्रेजों ने उनकी तलाश में जंगल का कोना-कोना छान मारा
लेकिन बंधू सिंह(Bandhu singh) नके हाथ न आये। इलाके के एक व्यवसायी की मुखबिरी के चलते बंधू सिंह
अंग्रेजों के हत्थे चढ़ गए।
अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया जहां उन्हें
फांसी की सजा सुनाई गयी, 12 अगस्त 1857 को गोरखपुर में अली नगर चौराहा पर सार्वजनिक रूप से फांसी पर लटकाया गया।बताया जाता है कि अंग्रेजों ने उन्हें 6 बार फांसी पर चढ़ाने की कोशिश की लेकिन
वे सफल नहीं हुए। इसके बाद बंधू सिंह(Bandhu singh) ने स्वयं देवी माँ का ध्यान करते हुए मन्नत मांगी
कि माँ उन्हें जाने दें। कहते हैं कि बंधू सींह की प्रार्थना देवी ने सुन ली और सातवीं बार में
अंग्रेज उन्हें फांसी पर चढ़ाने में सफल हो गए।
अमर शहीद बंधू सिंह को सम्मानित करने के लिए यहाँ एक स्मारक भी बना हैं।
दूसरी विशेषता यहाँ मिलने वाला मटन बाटी का प्रसाद:-
यह देश का इकलौता मंदिर है जहाँ प्रसाद के रूप में मटन दिया जाता हैं। बंधू सिंह ने अंग्रेजो के सिर चढ़ा के जो बाली कि परम्परा शुरू करी थी वो आज भी यहाँ चालु हैं। अब यहाँ पर बकरे कि बलि चढ़ाई जाती है उसके बाद बकरे के मांस को मिट्टी के बरतनों में पका कर प्रसाद के रूप में बाटा जाता हैं साथ में बाटी भी दी जाती हैं।
वैसे तो पुराने समय में देवी के कई मंदिरो में बलि कि परम्परा थी लेकिन समय के साथ साथ लगभग सभी जगह से यह परम्परा बंद कर दी गयी लेकिन तरकुलहा देवी (Tarkulha Devi) के मंदिर में यह अब भी चालु है हालाकि इस पर अब काफी विवाद है और इसे बंद कराने के लिए कोर्ट में केस भी चल रहा हैं।
Matan Baati
तरकुलहा देवी (Tarkulha Devi) मंदिर में साल में एक बार मेला भरा जाता हैं जिसकी शुरुआत चेत्र रामनवमी से होती हैं यह मेला एक महीने चलता हैं। यहाँ पर मन्नत पूरी होने पर घंटी बाँधने का भी रिवाज़ हैं, यहाँ आपको पुरे मंदिर परिसर में जगह जगह घंटिया बंधी दिख जायेगी। यहाँ पर सोमवार और शुक्रवार के दिन काफी भीड़ रहती हैं।
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माया कैलेंडर
माया कैलेंडर (मायान/मायन या मयन/ मेसो) अमेरिकन सभ्यता की देन है। क़रीब 250 से लेकर 900 ईसा पूर्व (साउथ ईस्ट मेक्सिको, बैलीज़, पश्चिमी होंडूरास और अल सल्वाडोर) में माया संस्कृति नामक एक प्राचीन सभ्यता विकसित हुई थी। इसे मेसो-अमेरिकन सभ्यता भी कहा जाता है। माया सभ्यता कोलंबियाई मीसो अमेरिकी सभ्यता से पहले की मानी जाती है। जहां पर आज मैक्सिको का यूकाटन नामक स्थान है वहां किसी जमाने में माया सभ्यता के लोग रहा करते थे। माया सभ्यता के लोग कला, गणित, वास्तुशास्त्र, ज्योतिष और लेखन आदि के क्षेत्र में काफ़ी अग्रणी थे। स्पेनी आक्रांताओं के आने के बाद उनकी सभ्यता और संस्कृति का धीरे धीरे क्षरण होने लगा।
ग्वाटेमाला , मैक्सिको, होंडुरास तथा यूकाटन प्रायद्वीप में इस सभ्यता के अवशेष खोजकर्ताओं को मिले हैं।
ऐतिहासिक प्रमाण
यूं तो इस इलाक़े में ईसा से दस हज़ार साल पहले से बसावट शुरू होने के प्रमाण मिले हैं और 1800 साल ईसा पूर्व से प्रशांत महासागर के तटीय इलाक़ों में गांव भी बसने शुरू हो चुके थे। लेकिन कुछ पुरातत्व वेत्ताओं का मानना है कि ईसा से कोई एक हज़ार साल पहले, माया सभ्यता के लोगों ने आनुष्ठानिक इमारतें बनाना शुरू कर दिया था और 600 साल ईसापूर्व तक बहुत से परिसर बना लिए थे। सन् 250 से 900 के बीच विशाल स्तर पर भवन निर्माण कार्य हुआ, शहर बसे। इसे कलात्मक विकास का स्वर्ण युग कहा जाता है। कृषि का विकास हुआ और नगर प्रधान राज्य बने। उनकी सबसे उल्लेखनीय इमारतें पिरामिड हैं जो उन्होंने धार्मिक केंद्रों में बनाईं लेकिन फिर सन् 900 के बाद माया सभ्यता के इन नगरों का ह्रास होने लगा और नगर ख़ाली हो गए। ऐसा क्यों हुआ इसपर बहुत से मत हैं। कुछ का मानना है कि विदेशी आक्रमण या विद्रोह के कारण इस सभ्यता का पतन हुआ और कुछ कहते हैं कि किसी प्राकृतिक विपदा या महामारी के कारण ऐसा हुआ।
गणित और खगोल के क्षेत्र में उल्लेखनीय विकास
प्राचीन माया सभ्यता के काल में गणित और खगोल के क्षेत्र में उल्लेखनीय विकास हुआ। माया संस्कृति के लोग प्रखर खगोलशाष्त्री और ज्योतिष थे। इस मेसो अमेरिकन सभ्यता की सबसे बड़ी ख़ासियत इसका खगोलीय ज्ञान थी। इस सभ्यता ने शुक्र को आधार बनाकर भविष्यवाणी कीं। इस सभ्यता ने चंद्रमा से
धरती की दूरी और विभिन्न ग्रहों की स्थिति की इतनी सटीक जानकारी दी कि वैज्ञानिक भी हैरत में हैं। माया-सभ्यता के युग के लोगों ने विभिन्न घटनाओं, धार्मिक त्योहारों और जन्म-मरण संबंधी बातों का रिकार्ड रखने के लिए कैलेंडर का विकास किया था। अपने ज्ञान के आधार पर माया लोगों ने एक कैलेंडर बनाया था। कहा जाता है कि उनके द्वारा बनाया गया कैलेंडर इतना सटीक निकला है कि आज के सुपर कम्प्यूटर भी उसकी गणनाओं में 0.06 तक का ही फ़र्क़ निकाल सके और माया कैलेंडर के अनेक आकलन, जिनकी गणना हजारों सालों पहले की गई थी, सही साबित हुए हैं।
सामान्य परिचय
माया कैलेंडर का एक साल 290 दिन का होता है। माया कैलेंडर में तारीख तीन प्रकार से निर्धारित होते हैं। तारीख का निर्धारण लंबी गिनती, जॉलकिन यानि ईश्वरीय कैलेंडर और हाब यानि लोक कैलेंडर के जरिए होता है। इन्हीं के आधार पर माया सभ्यता के लोग भविष्यवाणियां करते हैं। माया सभ्यता की गणना और पंचांग को ही माया कैलेंडर कहा जाता है। माया कैलेंडर में 20 - 20 दिनों के 18 महीने होते थे और 365 दिन पूरा करने के लिए 5 दिन अतिरिक्त जोड़ दिए जाते थे। इन 5 दिनों को अशुभ माना जाता था।
माया कैलेंडर के महीने
1. Pop (पॉप)
2. Uo (उओ)
3. Zip (जिप)
4. Zotz (जॉ्ट्ज)
5. Tzec (टीजेक)
6. Xul (जुल)
7. Yaxkin (याक्सकिन)
8. Mol (मोल)
9. Chen (चेन)
10. Yax (याक्स)
11. Zac (जैक)
12. Ceh (सेह)
13. Mac (मैक)
14. Kankin (कान किन)
15. Muan (मुआन)
16. Pax (पैक्स)
17. Kayab (कयाब)
18. Cumbu (कुम्बू)
21 दिसंबर, 2012
माया सभ्यता के लोगों की मान्यता थी कि जब उनके कैलेंडर की तारीखें खत्म होती हैं, तो धरती पर प्रलय आता है और नए युग की शुरुआत होती है। उनके द्वारा विकसित लोंग काउंट कैलेंडर ई. पू. 3114 (BC) से शुरू हो रहा है, जो बक्तूनों में बंटा है। इस कैलेंडर के हिसाब से 394 साल का एक बक्तून होता है और पूरा कैलेंडर 13 बक्तूनों में बंटा है। माया संस्कृति के लोग 13 के आँकड़े को बहुत महत्व देते थे और 13वाँ बकतून 21 दिसम्बर 2012 के आसपास समाप्त होता है। इसीलिये माना गया कि 21 दिसंबर , 2012 को
पृथ्वी का विनाश हो जायेगा। कैलेंडर के अनुसार यह बताया गया कि प्लैनेट-एक्स निबिरू नाम का एक ग्रह दिसंबर-2012 को पृथ्वी से टकराएगा और यह टक्कर सुनामी, भूकंप और ज्वालामुखी विस्फोट पैदा करेगी और इस पृथ्वी का नामोनिशान मिट जाएगा। इसके अलावा, इस कैलेंडर ने यह भविष्यवाणी भी की थी कि 26 हज़ार साल में पहली बार सूर्य
आकाशगंगा के मध्यवर्ती समतल को पार करेगा। यह धरती के लिए काफ़ी विनाशकारी साबित होगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, क्योंकि नासा एस्ट्रोबायोलॉजी इंस्टिट्यूट के सीनियर साइंटिस्ट डेविड मोरिसन ने कहा कि सूर्य के आकाशगंगा के मध्यवर्ती समतल को पार करने की बात ही सही नहीं है। नेशनल ज्योग्राफिक न्यूज ने अपनी एक रिपोर्ट में भी इन आशंकाओं को वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर सिलसिलेवार ढंग से पूरी तरह खारिज कर दिखाया। कोर्नल विश्वविद्यालय में खगोलविद ऐन मार्टिन के अनुसार मायन कैलेंडर का डिजायन आवर्ती है। ऐसे में यह कहना कि दीर्घ गणना दिसंबर 2012 को समाप्त हो रही है, सही नहीं है। ऐन का कहना है कि यह महज मायन समाज में महान कैलेंडर चक्र की समाप्ति है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे हमारी सभ्यता ने नई सहस्त्राब्दी का स्वागत किया था। इस प्रकार यह माना जा सकता है कि माया कैलेण्डर के वर्ष का समाप्त होना बिल्कुल सामान्य घटना है। माया कैलेण्डर में एक साथ दो दो साल, पहला 260 दिनों का और दूसरा 365 दिनों के चलते थे। 365 दिन का साल तो निश्चित तौर पर सौर गति पर आधारित होता होगा, जबकि 260 दिनों का साल संभवत: 9 चंद्रमास का होता हो। इस तरह इसके 4 चंद्रवर्ष पूरे होने पर 3 सौरवर्ष ही पूरे होते होंगे, जिसका सटीक तालमेल करते हुए वर्ष के आकलन के साथ ही साथ ग्रह नक्षत्रों और सूर्यग्रहण , चंद्रग्रहण तक के आकलन का उन्हें विशिष्ट ज्ञान था। इससे उनके गणित ज्योतिष के विशेषज्ञ होने का पता तो चलता है, पर फलित ज्योतिष की विशेषज्ञता की पुष्टि नहीं होती है।
कैसे खत्म हुई माया सभ्यता
हमारी धरती पर हजारों साल पहले माया सभ्यता मौजूद थी लेकिन किन्हीं कारणों से यह सभ्यता खत्म हो गई। माया सभ्यता का अंत का रहस्य क्या है, वैज्ञानिक इस पर से पर्दा उठाने की कोशिशों में लगे हुए हैं। इस बारे में हाल में एक और रिसर्च सामने आई है। इसमें कहा गया कि माया सभ्यता का अंत करीब 100 से ज्यादा वर्षों तक लगातार सूखा पड़ने के कारण हुआ। इसके लिए शोधकर्ताओं ने मरीन लाइफ बेलिज के फेमस 'ब्लू होल' और उसके आसपास पाए जाने वाले लगूनों से लिए गए खनिजों का विश्लेषण किया। उन्होंने पाया कि 800 से 900 ई. के मध्य एक भयंकर सूखा पड़ा था, वही माया सभ्यता के अंत का प्रमुख कारण बना। 'लाइव साइंस' की रिपोर्ट के मुताबिक छठी सदी से लेकर 10वीं सदी तक भयंकर सूखा पड़ा जिससे माया सभ्यता का विनाश हो गया। क्या थी माया सभ्यता? माया सभ्यता कोलंबियाई मीसो अमेरिकी सभ्यता से पहले की मानी जाती है। जहां पर आज मैक्सिको का यूकाटन नामक स्थान है वहां किसी जमाने में माया सभ्यता के लोग रहा करते थे। इसे मेसो-अमेरिकन सभ्यता भी कहा जाता है। माया सभ्यता ग्वाटेमाला, मैक्सिको, होंडुरास और यूकाटन प्रायद्वीप में स्थित थी। यह मैक्सिको की एक महत्वपूर्ण सभ्यता थी। इस सभ्यता की शुरुआत 1500 ई. पू. में हुई। यह 300 ई० से 800 ई० तक काफी प्रगतिशील रही, फिर धीरे-धीरे इसका अंत हो गया। माया सभ्यता के लोग कला, गणित, वास्तुशास्त्र, ज्योतिष और लेखन आदि के क्षेत्र में काफी अव्वल थे। इसे कलात्मक विकास का स्वर्ण युग भी कहा जाता है। इस दौरान खेती और शहर का विकास हुआ। इस सभ्यता की सबसे उल्लेखनीय इमारतें पिरामिड हैं जो उन्होंने धार्मिक केंद्रों के रूप में में बनाए थे। दावा किया जाता है कि 900 ई. के बाद माया सभ्यता के इन नगरों का ह्रास होने लगा और नगर खाली होने लगे। ग्वाटेमाला, मैक्सिको, होंडुरास और यूकाटन प्रायद्वीप में इस सभ्यता के अवशेष खोजकर्ताओं को मिले हैं। माया सभ्यता के लोगों की सबसे बड़ी खासियत उनका खगोलीय ज्ञान थी। उन्होंने विभिन्न घटनाओं, धार्मिक त्योहारों और जन्म-मरण संबंधी बातों का रेकार्ड रखने के लिए कैलेंडर बनाया था। माया सभ्यता की गणना और पंचांग को माया कैलेंडर कहा जाता था। इसका एक साल 290 दिन का होता था। माया कैलेंडर में तारीख तीन तरह से निर्धारित होती थीं। तारीख का निर्धारण लंबी गिनती, जॉलकिन यानी ईश्वरीय कैलेंडर और हाब यानि लोक कैलेंडर के जरिए होता था। इसी आधार पर माया सभ्यता के लोग भविष्यवाणियां करते थे। माया सभ्यता के लोगों की मान्यता थी कि जब उनके कैलेंडर की तारीखें खत्म होती हैं, तो धरती पर प्रलय आता है और नए युग की शुरुआत होती है। 21 दिसंबर 2012 को दुनिया के अंत होने की भविष्यवाणी भी इसी माया कैलेंडर ने दी थी, लेकिन यह गलत साबित हुई। बहरहाल, माया सभ्यता का अंत क्यों हुआ, इसपर शोधकर्ताओं के बहुत से मत हैं। कुछ का मानना है कि विदेशी आक्रमण या विद्रोह के कारण इस सभ्यता का पतन हुआ, कुछ कहते हैं कि प्राकृतिक आपदा जैसे, सूखा या महामारी के कारण यह सभ्यता खत्म हुई। ब्लू होल क्या है? ग्रेट ब्लू होल सेंट्रल अमेरिका यानी कैरेबियन सी के बेलिज शहर से लगभग 70 किलोमीटर दूर लाइटहाउस रीफ के पास स्थित है। 300 मीटर (984 फीट) के एरिया में फैला यह होल एक वृत्त के समान है। लगभग 124 मीटर (400 फीट) गहरा यह अंडर वॉटर सिंकहोल दुनिया के टॉप 10 स्कूबा डाइविंग डेस्टिनेशंस में से एक है। यहां की खूबसूरत मरीन लाइफ बेलिज बैरियर रीफ रिजर्व सिस्टम का हिस्सा है। इसे यूनेस्को ने वर्ल्ड हैरिटेज साइट घोषित कर दिया है। गौरतलब है कि ग्रेट ब्लू होल उस केव सिस्टम का हिस्सा है, जो हजारों साल पहले निचले समुद्र तल की वजह से बना था। यहां मौजूद खनिजों का अध्ययन करने के बाद शोधकर्ताओं ने पता लगाया कि यह होल 15 हजार साल पुराना है। ब्रिटिश स्कूबा डाइवर और लेखक नेड मिडलटन ने इस जगह को 'ग्रेट ब्लू होल' नाम दिया है। डिस्कवरी चैनल ने इसे दुनिया की सबसे खूबसूरत जगह माना है। ब्लू होल से क्या रिश्ता हाल में बिग ब्लू होल का अध्ययन करने के बाद वैज्ञानिकों को कुछ महत्वपू्र्ण तथ्यों के बारे में पता चला जिससे अंदाजा होता है कि माया सभ्यता के अंत संबंधी कथनों में ब्लू होल से जुड़े रहस्यों की प्रमुख भूमिका है। टेक्सास की राइस यूनिवर्सिटी और लुसियाना स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के नए रिसर्च में कुछ सबूत भी सामने आए। वैज्ञानिकों ने सिंकहोल में पाए जाने वाले खनिजों के कलर, आकार और मोटाई का अध्ययन किया। उन्होंने माया सभ्यता के अंत के समय यानी 9वीं और 10वीं सदी के दौरान खनिजों (टाइटेनियम से एल्यूमिनम) की प्रकृति में होने वाले परिवर्तन से इसकी तुलना की। उन्होंने पाया कि इन दो खनिजों की मात्रा प्रकृति में बढ़ने और घटने के कारण किसी खास क्षेत्र में बहुत ज्यादा बारिश हुई, तो कहीं सूखा पड़ा।